मकर संक्रांति का धार्मिक ही नहीं आध्यात्मिक व वैज्ञानिक है महत्व, सच्चाई जानकर रह जाएंगे हैरान

मकर संक्रांति का पर्व इस बार दो दिन आस्था व उल्लास के साथ 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन लोग स्नान, ध्यान और दान कर पुण्य कमाएंगे। महिलाएं अपने बुजुर्गों, सेवकों और जरुरतमंद लोगों को वस्त्र, तिल व गुड़ से बने व्यंजन, कंबल आदि कल्प कर पुण्य का अर्जन करेंगी। मकर संक्रांति हिंदुओं का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। वैसे तो सालभर में 12 सूर्य संक्रांति आती है, लेकिन मकर संक्राति का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का योग बनता है, लेकिन इसके अलावा भी कई सारे बदलाव आते हैं। मकर संक्रांति का जितना धार्मिक महत्व है उतना ही वैज्ञानिक महत्व है। इस दिन भगवान सूर्य देव मध्यरात्रि के बाद सुबह दो बजकर छह मिनट पर धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसके साथ ही एक माह से चल रहा मलमास भी समाप्त हो जाएगा। इस दिन पूरे दिन पुण्यकाल रहेगा।संक्रांति का आध्यात्मिक महत्वज्योतिषाचार्य पं. सुरेश शास्त्री ने बताया कि इस दिन भगवान सूर्यदेव अपने शनिदेव से मिलने के लिए शनि के घर में प्रवेश करते हैं। इसके चलते लोग शनि के प्रकोप से बचने के लिए सूर्य को अघ्र्य चढ़ाते हैं। इस दिन से सूर्यदेव उत्तरायण होना शुरू हो जाएंगे। इससे दिन बड़े और राते छोटी होना शुरू हो जाएगी। ऐसा माना जाता है कि बसंत का आगमन भी इसी दिन से होता है। वहीं मलमास समाप्त होने से मांगलिक कार्य शुरू होंगे।संक्रांति का वैज्ञानिक महत्वपं.डॉ. रवि शर्मा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन से ही जलाशयों में वाष्पन क्रिया शुरू होने लगती है, जिसमें स्नान करने से स्फूर्ति व ऊर्जा का संचार होता है। इसी कारण इस दिन पवित्र नदी और जलाशयों में स्नान करने का महत्व माना गया है। इस दिन गुड़ व तिल खाने का महत्व है। इससे शरीर को उष्णता व शक्ति मिलती है। इस दिन मूंग, चावल, मटर व अदरक से बनी खिचड़ी खाने से रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ती है।त्योहार एक नाम अनेकप. करुणाशंकर जोशी के अनुसार भारत सहित दक्षिणी एशिया के कई देशों में भी मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। हर प्रदेश व देश में इसका नाम व मनाए जाने का तरीका अलग-अलग है। यही तो हमारी एकता में अनेकता को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल में लोहड़ी, दक्षिण भारत में पोंगल, कर्नाटक में सुग्गी, पूर्वोत्तर भारत में बिहू, ओडिशा में मकर चैला, बंगाल में पौष संक्रांति, गुजरात व उत्तराखण्ड में उत्तरायणी एवं बुंदेलखंड, बिहार और मध्यप्रदेश में खिचड़ी या सकरात आदि रूपों में इस पर्व को मनाते हैं। इस त्योहार को नेपाल, थाइलैंड, मायांमार, कंबोडिया और श्रीलंका में भी इस त्योहार को श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है।राशि के अनुसार दान का महत्वमकर संक्रांति के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व माना गया है। पंडित जोशी के अनुसार इस दिन तिल व गुड़ के बने व्यंजन, खिचड़ी, ऊनी वस्त्र आदि का दान करने का विधान है। इस दिन किए गए दान-पुण्य से कई गुणा अधिक फल मिलता है। राशि के अनुसार दान करने से इसका फल और अधिक हो जाता है।मेष- लाल वस्त्र, तांबे के बर्तन, मसूर की दाल।वृषभ- चावल, खिचड़ी, चांदी की वस्तु, घी।मिथुन-हरे व पीले वस्त्र, हरी सब्जी, मूंग।कर्क-सफेद वस्त्र, तंदुल व सफेद ऊन।सिंह- गेहूं, गुड़, ताम्र पात्र व लाल कपड़े।कन्या- गो अर्क, फल, खड़ाऊ, हरी घास।तुला- सप्तधान, इत्र।वृश्चिक- गेहूं, गुड़, लाल वस्त्र।धनु- शक्कर, हल्दी, स्वर्ण व पीले वस्त्र।मकर- काला कंबल, काले तिल।कुंभ- गाय का घी, काले वस्त्र।मीन- चने की दाल, धर्म ग्रंथ व पीले वस्त्र।
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