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वीतरागता के आकर्षण से सिद्धत्व की प्राप्ति का तीर्थ है सिद्धवरकूट- आचार्य विद्यासागर

खंडवा. एक बार यदि हमारी दृष्टि वीतरागता की ओर जम जाती है तो फिर दृष्टि दूसरी ओर नहीं जा पाती। चक्रवर्ती कामदेव की भी दुनिया में अपनी कामना की पूर्ति नहीं हुई, वह यहां पर हुई। इसलिए दो चक्री, दस कामदेव सहित साढ़े तीन करोड़ मुनिराजों ने यहां आकर सिद्ध पद की प्राप्ति की है । चक्रवर्ती-कामदेव-तीर्थंकर ये सब पद महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण यदि कोई पद है तो वह सिद्ध पद ही है। सिद्धवरकूट में वीतरागता का आकर्षण है जो सिद्धत्व की प्राप्ति करा सकता है। यह बात राष्ट्रसंत आचार्यश्री विद्यासागरजी मुनिराज ने अपने 31 शिष्यों के साथ सिद्धवरकूट प्रवेश के उपरांत दिया।
क्षेत्र के प्रचार-प्रसार समिति के राजेंद्र महावीर सनावद एवं सुनील जैन खंडवा ने बताया कि सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर से लगभग 135 किमी पद विहार घनघोर जंगलों के बीच करते हुए आचार्यश्री 23 वर्ष बाद सोमवार को प्रात: 8.15 बजे सिद्धवरकूट पहुंचे। प्रथम पाद प्रक्षालन किरणबाई, सुंदरबाई लश्करे परिवार (सनावद) ने किया। पूर्व दिशा के नवीन द्वार से आचार्य संघ ने प्रवेश कर मूलनायक श्री संभवनाथ मंदिर के दर्शन किए। इसके उपरांत समस्त मंदिरों के दर्शन कर विगत 22 वर्षों में क्षेत्र पर हुई प्रगति को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की। क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष प्रदीपकुमार कासलीवाल, महामंत्री विजय काला, वर्किंग ट्रस्टी बाबूलाल जैन, आशीष चौधरी, मुकेश जैन, संतोष मामा, कैलाश मोटाघर, अमरीश जैन, नरेश मामा, सुनील ठेकेदार, नरेंद्र जैन, विजय जैन, सुधीर चौधरी, आशीष जैन, दिलीप पहाडिय़ा, आशीष झांझरी, डॉ. नरेन्द्र जैन, दिनेश पाटनी, हेमचंद पाटनी सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने जय-जयकार के साथ आचार्य संघ की आगवानी की। संचालन बाल ब्रह्मचारी सुनील भैया ने किया।
आहार दान के लिए 40 चौके प्रतीक्षारत
कमेटी के आशीष चौधरी ने बताया कि आचार्यसंघ को आहारदान देने के लिए संपूर्ण देशभर से समाजजन आ रहे है। वर्तमान में 35 चौके चल रहे है, 40 चौकों की वेटिंग है। सिद्धवरकूट प्रवास का प्रथम आहार एनएचडीसी के उपमहाप्रबंधक आशीष जैन के यहां हुआ। सभी श्रद्धालुओं की भोजन व्यवस्था महामंत्री विजय विमलचंदजी काला परिवार सनावद द्वारा की गई।



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