एक तरफ टूर्नामेंट की तैयारी दूसरी तरफ बेच रही फल, जानिए क्यों

सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश भारत में क्रिकेट को धर्म की तरह पूजा जाता है। एक तरफ जहाँ देश की सबसे महँगी लीग आईपीएल की धूम है तो वहीं दूसरी तरफ इससे जुड़े खिलाड़ी महज टूर्नामेंट खेलकर करोड़ों कमा रहे हैं। आईपीएल की तर्ज़ पर अन्य खेलों की लीग की शुरुआत हो चुकी है। इन लीगों में खेलने वाले खिलाड़ियों की चमक सातवें आसमान पर दिखाई देती हैं। यह एक पक्ष हैं।दूसरा पक्ष तो इतना भयानक है कि आपको यकीन करना मुश्किल हो जाएगा कि इस देश के खिलाड़ियों की हालत बद से बद्द्तर है। आपको बता दें कि हाल ही में मणिपुर की राजधानी इंफ़ाल में एक नज़ारा देखने मिला जिसे देखकर एक सवाल जेहन में उठता है कि क्या वाकई में इस देश में खिलाड़ियों की आर्थिक स्थित संतोषजनक है।दरअसल, इंफ़ाल की सड़कों पर एक महिला को फल बेचते देखा गया। यह कोई और नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की ताइक्वॉन्डो खिलाड़ी डायना निंगबोम थी जो आगामी टूर्नामेंटों में लगने वाली राशि के लिए इंफ़ाल की सड़कों पर फलों का स्टाल लगाने का काम कर रही हैं। फल बेच कर वो रोजाना 300 से 400 रुपए तक की कमाई कर लेती हैं। स्थानीय ग्राहक भी उनके इस काम से प्रभावित होकर उनकी हौसलाअफज़ाई करते हैं। कई नेकदिल ग्राहक तो ऐसे भी हैं जो उन्हें कीमत से अधिक पैसे दे देते हैं ताकि डायना की आर्थिक सहायता हो सके।एक इंटरव्यू में डायना कहती हैं कि “मैं एक मिसाल कायम करना चाहती थी कि हमें अपने काम के लिए किसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता। सभी को काम करना चाहिए। सभी अपनी जरूरतों के मुताबिक मेहनत कर पैसा कमा सकते हैं।” वो आगे कहती हैं कि “मैं एक खिलाड़ी हूं, लेकिन मुझे इस काम में कोई दिक्कत नहीं महसूस होती है और न ही कोई शर्म। अपनी इस सोच के साथ ही मैंने फ्रूट सलाद बेचना शुरू किया है।” कई मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी डायना कहती हैं कि “मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती। यहाँ तक अपने माता-पिता पर भी नहीं।”तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी, डायना रोज अलसुबह 3 बजे उठकर फल की दुकान की तैयारी में लग जाती है। सवेरे 4 बजे से लेकर 7 बजे तक वो फ्रूट सलाद की दुकान लगाती हैं और शाम होते ही ‘लांगजिंग अचूबा माखा लकाई स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ में प्रैक्टिस करने जाती हैं। वो इन दिनों हॉन्ग कॉन्ग में होने वाले टूर्नामेंट की तैयारी कर रही हैं। डायना के पिता प्रिंटिंग प्रेस में एक मकैनिक की हैसियत से काम करते हैं और उनकी मां स्थानीय ईमा बाज़ार में काम करती हैं।डायना ने साल 2006 में ताईक्वॉन्डो सीखना शुरू किया था। अब तक उन्होंने 15 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए कई पदक जीत चुकी हैं। यही नहीं उन्होंने साल 2018 में दक्षिण कोरिया के कुक्किवन में रजत पदक भी जीता था। आज उनकी माली हालत का यह आलम है कि उन्हें सड़क के किनारे फल बेचने पड़ रहे हैं। सरकारी मदद के इंतजार के बजाय डायना अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपना रास्ता खुद ही बना रही हैं।जब ओलंपिक खेलों की पदक तालिका में भारत का नाम सबसे नीचे होता है तब मन में सहज ही एक सवाल उठता है कि क्या सवा सौ करोड़ आबादी वाले इस देश में प्रतिभावान खिलाड़ियों का आकाल पड़ गया है? अक्सर खेल खत्म होने के बाद हम बड़ी आसानी से खिलाड़ियों को भुला देते हैं। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि देश में कई अच्छे खिलाड़ी सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के आभाव की वजह से पीछे रह जाते हैं।इधर बीटीसी सरकार की तरफ से बीटीसी के कार्यकारी सदस्य लौगथ्राओ दैमारी ने पांच लाख रुपए चेक प्रदान किया। बीटीसी के अध्यक्ष त्रिदीप दैमारी की अध्यक्षता में आयोजित सभा में कलाईगांव के विधायक महेश्वर बोड़ो ने स्वागत भाषण दिया। मंगलदै के विधायक गुरुज्योति दास और बानेरी की विधायक कमली बसुमतारी ने भी इस मौके पर अपनी बात रखी। कैबिनेट मंत्री रिहन दैमारी ने एक स्मारिका का विमोचन किया।
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