ये है भारत की पहली ट्रांसजेंडर Judge, स्कूल छोड़ा, घर छोड़ा, भीख भी मांगी

देश को जोयिता मंडल के रूप में पहली ट्रांसजेंडर जज मिल गई है। उनकी नियुक्ति पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर की लोक अदालत में की गई है। उत्तर दिनाजपुर की सब डिवीजनल लीगल सर्विसेज कमेटी ऑफ इस्लामपुर ने जोयिता को नियुक्त किया है। जोयिता इस समुदाय की उन चंद लोगों में से है, जिन्होंने तमाम कठिनाईयों का सामना करते हुए कामयाबी की इबारत लिखी है। इसी साल 8 जुलाई को 29 वर्षीय जोयिता ने दफ्तर में काम शुरू किया। जोयिता का जन्म कोलकात में जयंत मंडल के तौर पर हुआ था। उन्हें बचपन से ही काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा, घर वाले उनकी हरकतों से परेशान होकर उन्हें डांटते थे। स्कूल में उन पर फब्तियां कसी जाती थी। मजबूरन उन्हें पहले स्कूल छोडऩा पड़ा फिर 2009 में उन्होंने अपना घर भी छोड़ दिया। तब नौकरी के लिए कॉल सेंटर ज्वाइन किया, वहां भी उनका मजाक बनाया जाने लगा। कई बार भीख मांगकर गुजारा करना पड़ा। कहीं पर कोई किराये पर कमरा देने के लिए तैयार नहीं होता था। ऐसे में उन्हें कई बार खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी। बाद में जोयिता एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई और सोशल वर्क को अपने जीवन का आधार बना लिया। 2010 से वह सोशल वर्कर के रूप में काम कर रही है। 29 साल की जोयिता लंबी लड़ाई के बाद लोक अदालत की जज बनी। अब वह दूसरों को न्याय दिलाने का काम करेंगी। लोक अदालत में नियुक्ति के फैसले से जोयिता काफी खुश है। उन्होंने कहा कि देश में काफी ट्रांसजेंडर्स ऐसी हैं, जिन्हें अगर मौका मिले तो काफी बेहतर कर सकती हैं। एक साक्षात्कार में जोयिता ने बताया कि 2010 में वो दिनाजपुर आई। उस वक्त यहां एलजीबीटी लोगों को उनके अधिकारों के बारे में पता नहीं था। फिर उन्होंने नया रोशनी फॉर दिनाजपुर डिस्ट्रिक्ट संस्था बनाकर काम शुरू किया। वे एलजीबीटी कम्यूनिटी के मौलिक अधिकारों के लिए सरकार के पास जाती थी। जोयिता ने बताया कि उनके साथी जज भी बहुत सहयोगी हैं और उनके साथ सम्मान से पेश आते हैं लेकिन अब भी कुछ लोग हैं जो उन्हें अजीब निगाहों से देखते हैं। कई लोग तो ऐसे हैं जो उन्हें जज की भूमिका में देख कर चौंक जाते हैं। जोयिता के मुतिाबिक समाज के नजरिए में बदलाव आने में वक्त लगता है। सुप्रीम कोर्ट के 15 अप्रेल 2014 के ऐतिहासिक फैसले के बाद ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के रूप में एक अलग पहचान मिली। इससे पहले इन्हें पुरुष या महिला के रूप में खुद को दर्शाना होता था। एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 20 लाख ट्रांसजेंडर हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वोटर आईडी कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट से लेकर तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकार व गैर सरकार फॉर्म में अब थर्ड जेंडर के रूप में ये अपनी पहचान दर्ज कराती हैं। इंडियन रेल और आईआरसीटीसी ने भी नवंबर 2016 में टिकट रिजर्वेशन फॉर्म में ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में शामिल किया गया। सेंट्रल यूनिवर्सिटी और तमाम शिक्षण संस्थाओं में भी अब इन्हें तरजीह दी जा रही है। देश की अदालतों से मुकदमों का बोझ कम करने के लिए लोक अदालतों की शुरुआत की गई। स्थानीय स्तर के मामलों को निपटाने के लिए जल्दी और सस्ते तरीके से न्याय दिलाने के लिए जिला स्तर और स्थानीय स्तर पर इसका गठन किया जाता है। 1982 में सबसे पहली लोक अदालत का आयोजन गुजरात में किया गया था। 2002 में इसे स्थायी बना दिया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यहां पर अदालती कार्यवाही के लिए कोई शुल्क नहीं देना होता है। लोक अदालतों में सभी तरह के सिविल मामले, वैवाहिक विवाद, नागरिक मामले, भूमि विवाद, संपत्ति के विवाद निपटाए जाते हैं। दोनों पक्षों के बीच समझौते के जरिए विवादों का समाधन किया जाता है। लोक अदालतों में आपराधिक मामलों और एक करोड़ से अधिक मूल्य की संपत्ति के मामलों का निपटारा नहीं होता है।
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