मेकिंग ऑफ कोवैक्सिन द इनसाइड स्टोरी में खुलासा, 20 बंदरों ने बचाई इंसान की जान, जानिए कैसे

भारत के स्वदेशी कोरोना टीके कोवैक्सीन (Covaxin) को दुनिया के कई देश स्वीकार कर चुके हैं। इस टीके के तैयार होने में बंदरों की बड़ी भूमिका रही है। चौंकिए मत, इस बात का खुलासा हुआ है कि कोवैक्सीन के ट्रायल (Covaxin Trial) में 20 रीसस मकाक बंदरों (rhesus macaque monkeys) ने अहम भूमिका निभाई थी।‘गोइंग वायरल: मेकिंग ऑफ कोवैक्सिन द इनसाइड स्टोरी’ (The Inside Story of the Making of Covaxin) नामक किताब में इस बात का जिक्र किया गया है। किताब में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव (Dr. Balram Bhargava) भारत के स्वदेशी वैक्सीन को बनाने, ट्रायल और अप्रूवल के बारे में कुछ ऐसी बातों का जिक्र किया है, जिसके बारे में किसी को नहीं पता है। डॉ. भार्गव का कहना है कि यह याद रखना जरूरी है कि कोवैक्सीन (Covaxin) की सफलता की कहानी के नायक सिर्फ इंसान ही नहीं हैं क्योंकि इसमें 20 बंदरों का भी योगदान हैं। इनकी बदौलत अब हम में से लाखों लोगों के पास जीवन रक्षक टीका है।किताब में आगे कहा गया है कि जब हम इस स्तर पर पहुंचे, जहां हम यह जानते थे की वैक्सीन छोटे जानवरों में एंटीबॉडी बना सकती है, तो अगला कदम बंदर जैसे बड़े जानवरों पर इसका परीक्षण करना था। जिनके शरीर की संरचना और प्रतिरक्षा प्रणाली मनुष्यों से मिलती जुलती है। दुनिया भर में चिकित्सा अनुसंधान में उपयोग किए जाने वाले रीसस मकाक बंदरों को इस तरह के रिसर्च के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। डॉ. भार्गव ने कहा कि आइसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के सामने सबसे बड़ी बाधा यह थी कि रीसस मकाक बंदरों (rhesus macaque monkeys) को कहां से लाएं? इसके लिए जवान बंदरों की जरूरत थी जिनके शरीर में अच्छी एंटीबॉडी हो। लॉकडाउन के कारण इन बंदरों के सामने भोजन संकट पैदा हो गया था, जिसके कारण वह घने जंगल में चले गए थे। इसके बाद वैज्ञानिकों की मदद के लिए महाराष्ट्र के वन विभाग ने वर्ग किलोमीटर जंगलों को स्कैन करके नागपुर में बंदरों को ट्रैक किया।
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