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भारत के 39 अस्पतालों में करीब ढाई महीने चला ट्रायल, अब कोरोना को लेकर हुआ चौंकाने वाला खुलासा


कोरोना वैक्सीन का ट्रायल बीच में रोकने के बाद अब एक और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिसर्च के अनुसार कॉन्वलसेंट प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना वायरस के गंभीर मरीजों के इलाज में कोई खास मदद नहीं मिलती है। इतना ही नहीं थेरेपी मृत्‍यु दर कम करने में भी कारगर साबित नहीं हो रही। गौरतलब है कि कोरोना मरीजों पर प्‍लाज्‍मा थेरेपी का असर जानने के लिए देशभर के 39 निजी और सरकारी अस्पतालों 22 अप्रैल से 14 जुलाई के बीच ट्रायल हुआ था। नतीजे बताते हैं कि 28 दिन के समय में प्‍लाज्‍मा थेरेपी पाने वाले मरीजों और आम इलाज पा रहे मरीजों की हालत में कोई अंतर नहीं पाया गया।ICMR ने ‘ओपन-लेबल पैरलल-आर्म फेज 2 मल्टीसेन्टर रेंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल’ (PLACID ट्रायल) में कुल 464 मरीजों पर प्‍लाज्‍मा थेरेपी के असर की जांच की। MedRxiv में छपी स्‍टडी के अनुसार, कॉन्वलसेंट प्लाज्मा मृत्यु दर को कम करने और कोविड-19 के गंभीर मरीजों के इलाज करने में कोई खास कारगर नहीं है। ICMR की रिसर्च यह भी कहती है कि कॉन्वलसेंट प्लाज्मा के इस्‍तेमाल को लेकर दो ही स्‍टडी छपी हैं, एक चीन और दूसरी नीदरलैंड से। दोनों ही देशों में इस थेरेपी को बंद कर दिया था।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 27 जून को जारी किए गए कोविड-19 के ‘क्लिनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल’ में इस थेरेपी के इस्तेमाल को मंजूरी दी थी। इस थेरेपी में कोविड-19 से उबर चुके व्यक्ति के रक्त से ऐंटीबॉडीज लेकर उसे संक्रमित व्यक्ति में चढ़ाया जाता है, ताकि उसके शरीर में संक्रमण से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सके। ICMR ने पाया कि दोनों तरह के मरीजों (प्‍लाज्‍मा थेरेपी और सामान्‍य इलाज) की मृत्‍यु दर में फर्क बेहद कम (1%) था।

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