केंद्र ने कश्मीरियों के साथ खेला खेल, अब फारूक चलाएंगे अपना चक्रव्यूह

अनुच्छेद 370 हटाने के बाद उपजे हालात के बीच कश्मीर में लोगों का विश्वास जीतने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला को रिहा किया गया है। करीब सात माह से नजरबंद नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला की रिहाई हुई है। पांच बार सांसद और तीन बार मुख्यमंत्री रहे फारूक की रिहाई का रास्ता इस बार भी उनके मित्र व रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत ने ही खोला है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अनुच्छेद 370 हटाने से पहले 4 अगस्त 2019 की आधी रात को जब फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिया गया। फारूक को मिल सकता है नया पदसूत्र बताते हैं कि केंद्र की ओर से डॉ. फारूक का सम्मान बरकरार रखने के लिए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के लिए गठित परिसीमन आयोग में सदस्य भी बनाया जा सकता है। क्या केंद्र सरकार राज्य में लाभ उठाना चाहती है? इस आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई को बनाया गया है। साल 1999 में वाजपेयी सरकार ने दुलत को ही अब्दुल्ला को मनाने भेजा था, ताकि वह इंडियन एअरलाइंस के अपहृत विमान आईसी-814 को अपहर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के बदले आतंकी मसूद अजहर की रिहाई के लिए तैयार हो जाएं। फारूक अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे।रूबिया की रिहाई में भी दुलत का क्या रोलइतिहास को जब हम खंगालते हैं तो इससे पहले 1989 में केंद्र में तीसरे मोर्च की सरकार थी और वीपी सिंह प्रधानमंत्री। उस समय रॉ के प्रमुख के रूप में दुलत ने तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की अपहृत बेटी रूबिया सईद की रिहाई के बदले पांच आतंकियों की रिहाई कराई थी। जानकारी के लिए बता दें कि रूबिया का अपहरण जेकेएलएफ के आतंकियों ने किया था। बता दें कि पार्टी अध्यक्ष की रिहाई प्रदेश में लोकतंत्र की जड़ों को नए सिरे से मजबूत करेगी। हम सरकार के कदम का स्वागत करते हैं और आग्रह करते हैं कि वह उमर अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती समेत पीएसए में बंद अन्य नेताओं को भी शीघ्र रिहा करे।
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