सब्जी बेचकर मां ने बेटी को बनाया इंटरनेशनल बॉक्सर, भाई काटता है बाल

युवा और साहसी जमुना बोरा को आज कौन नहीं जानता। असम के सोनितपुर जिले के ढेकियाजुली की रहने वाली इस मुक्केबाज को अपने सपनों को पूरा करने के लिए बहुत दूर तक जाना है। बेलसिरी गांव में जन्मी जमुना ने सभी बाधाओं से जूझते हुए अपने सपने को पूरा किया है। 22 वर्षीय खिलाड़ी बॉक्सिंग के क्षेत्र में दिन-ब-दिन इतिहास रच रही हैं। आज सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन चुकी जमुना को आगे बढाने में उनकी मां निर्मला बोरा का बड़ा योगदान रहा है। उनकी मां ने जमुना को अपने सपने पूरा करने में कही भी उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति को आड़े नहीं आने दिया। बेटी के मुक्केबाजी के सपने को पूरा करने के लिए मां निर्मला ने सब्जियां भी बेची।7 मई 1997 को जन्मी जमुना ने 2009 में वुशु(चीनी मार्शल आर्ट) के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वह जिला स्तर पर भी वुशु खिलाड़ी के रूप में स्वर्ण पदक जीत चुकी है। इसी साल बाद में भारतीय खेल प्राधिकरण के साथ प्रशिक्षण मिलने पर उन्होंने बॉक्सिंग के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया।अपने खेल करियर में खिलाड़ी ने अनेक उपलबिधयां हासिल की है, जिनमें 2013 में सर्बिया में हुए दूसरे नेशनल कप इंटरनेशनल सब-जूनियर गर्ल्स बॉक्सिंग टूर्नामेंट में स्वर्ण कप जीतने के साथ ही कई अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धाओ में भी पदक प्राप्त किए हैं। इसके साथ ही 2014 में जमुना ने रुस में एक और टाइटल अपने नाम किया।2015 में जमुना ने ताइपे में हुई विश्व मुक्केबाजी चैंम्पियनशिप में 57 किलोग्राम वर्ग में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। साथ ही जमुना गुवाहाटी में हुए दूसरे इंडिया ओपन इंटरनेशनल बॉक्सिंग टूर्नामेंट में भी स्वर्ण पदक जीत चुकी है।10 वर्ष की उम्र में पिता का साया खो देने वाली खिलाड़ी का एक बड़ा भाई और एक बहन है। जमुना ने अपनी स्कूली शिक्षा मेजेनगुली प्राइमरी स्कूल से, हायर सैकेंडरी आर्य विद्यापीठ और स्नातक लोकनायक ओमो कुमार दास कॉलेज से पूरी की है।यह गर्व की बात है कि इस खिलाड़ी का नाम बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया में पंजीकृत है। साथ ही जमुना असम राइफल्स की कर्मचारी भी है।बाक्सिंग में अपना नाम बनाने वाली जमुना शापिंग और घूमने की शौकीन है। साथ ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी सक्रिय रहती हैं।
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