कुंभ को टक्कर देगा अंबुबाची, लगेगा तांत्रिकों का मेला

इस साल आयोजित हुए दिव्य कुंभ को किसने नहीं देखा। प्रशासन की तैयारियों से लबरेज और करोड़ों की भीड़ इस बार कुंभ में चर्चा का विषय थी लेकिन पूरे भारत मेें केवल कुंभ ही इकलौता नहीं है बल्कि ऐसा ही एक और धार्मिक और विशाल मेला हर साल आयोजित होता है जो अपने आप में अनूठा, आश्चर्यजनक कई संस्कृतियों को समेटे हुए है। जी हां हम बात कर रहे है असम के गुवाहाटी में कामाख्या माता मंदिर में लगने वाले अंबुबाची मेले की जिसमें शामिल होने के लिए लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं और इस साल भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलेगा।शक्ति के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ जिसको हम कामाख्या मन्दिर के नाम से जानते हैं, असम के गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यह वह प्रसिद्ध मन्दिर है , जहाँ माता सती का योनि और गर्भभाग आकर गिरे थे। कहा जाता है कि पिता द्वारा किये गए महादेव के अपमान से दुखी होकर माता सती ने पिताप्रजापति दक्ष के यज्ञ में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। जिससे दुखी महादेव ने सती केशव को लेकर तांडव करना शुरू कर दिया था। तब महादेव के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़कर माता के शव के टुकड़े कर दिये। जिसके फलस्वरूप माता का शव 51 अलग अलग टुकड़ो में धरतीपर गिरा और शक्तिपीठों केरूप में स्थापित हो गये। अतः कामाख्या मन्दिर भी उन्ही शक्तिपीठों में से एक है।तो यही वो असली वजह है जिसके चलते हर साल इस मन्दिर में जून के महीने में अम्बुबाची का ये त्यौहार मनाया जाता है। इस बार यह मेला 22 जून से 26 जून तक चलेगा। आपको बता दें कि कुंभ मेले की तरह ही ये मेला भी उतना ही महत्व रखता है। सूत्रों अनुसार इस साल भी यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना है जिस वजह से पुलिस प्रशासन और नगर निगम ने सारी तैयारियां कर ली हैं और सरकार सभी तैयारियों का जायजा लेने में लगी हुई है।इस मन्दिर और मेले का इतिहास से गहरा नाता है। कहा जाता है कि मेले के दौरान माता भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वतः बंद हो जाते है और दर्शन भी निषेध हो जाते है। तीन दिनों के उपरांत मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। इस मेले की विशालता इस बात से सिद्ध होती है कि इसमें देश- विदेश से लोग तंत्र,मंत्र,यंत्र हेतु आते है। इस मन्दिर का इतिहास नरकासुर नामक राक्षस के वध से भी जुडा हुआ है। इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं। मंदिर के पुजारियों द्वारा ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं। इस पर्व पर भारत ही नहीं बल्कि बांग्लादेश, तिब्बत और अफ्रीका जैसे देशों के तंत्र साधक यहां आकर अपनी साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करते हैं। वाममार्ग साधना का तो यह सर्वोच्च पीठ स्थल है। मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी इत्यादि तंत्र साधक भी सांवर तंत्र में अपना यहीं स्थान बनाकर अमर हो गये हैं।
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