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कारगिल युद्ध के हीरो सेवानिवृत्त कैप्टन को मिली बंदी शिविर से रिहाई


गुवाहाटी उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के एक दिन बाद कारगिल युद्ध में हिस्सा ले चुके सेवानिवृत्त सैनिक मोहम्मद सनाउल्लाह को आखिरकार शनिवार को राज्य के गोलपारा जिले में एक बंदी शिविर से रिहा कर दिया गया। पूरे तीस साल तक देश की सरहदों की रक्षा करने के बाद, पूरे तीस साल तक भारतीय सेना में काम करने के बाद, एनआरसी मामलों की जांच कर रहे एक अधिकारी की गलती के चलते मोहम्मद सनाउल्लाह को डिटेंशन कैंप में भेज दिया जाता है।कौन हैं सनाउल्लाह असम के कामरूप जिले में बोको के तहत आने वाले कलहिकाश गांव के रहने वाले सनाउल्लाह का जन्म 1967 में हुआ। 1987 में वो भारतीय सेना में शामिल हुए थे। 2017 में मानद कैप्टन के रूप में सेवानिवृत्त होने से पहले उन्होंने 30 वर्षों तक सेना में रहकर देश की सेवा की, जी हां 52 साल के सनाउल्लाह ने तीस वर्षों तक सेना में रहकर देश के लिए काम किया।क्या है पूरा मामला पिछले महीने असम में सेना के सेवानिवृत्त कैप्टन को असम पुलिस की सीमा शाखा ने विदेशी नागरिकों के संबंधित एक न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी घोषित कर दिया गया था जिसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया था। सनाउल्लाह बीते 29 मई से पश्चिमी असम के गोलपारा जिले के एक डिटेंशन कैंप में रह रहे थे। सुर्खियों में आने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया जिसके बाद गुवाहाटी उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने सनाउल्ला को उनके वकील इंदिरा जयसिंह और कई अन्य लोगों की दलीलें सुनने के बाद जमानत दे दी। इतना ही नहीं न्यायमूर्ति मनोजित भुइयां और न्यायमूर्ति पी. के. डेका ने इस मामले में भारत सरकार, असम सरकार, रक्षा मंत्रालय, असम पुलिस के जांच अधिकारी और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के अधिकारियों को भी नोटिस जारी कर दिया है। दरअसल एनआरसी ही वो प्रक्रिया है जिसके चलते सनाउल्लाह को विदेशी घोषित कर दिया गया था और वो बीते 29 मई डिटेंशन कैंप में अपने दिन गुजार रहे थे।आपको बता दें कि उन्हें 2014 में भारतीय सेना में जूनियर कमीशंड ऑफिसर (जेसीओ) के रूप में नियुक्त होने पर राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। सनाउल्लाह का मामला हमें प्रशासन की लापरवाही और कानून की ढीली-ढाली व्यवस्था की ओर रूख करने को मजबूर कर देता है।

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