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AN-32 Crash: शिकारियों ने की सेना की मदद, तब हासिल हुई सफलता


अरुणाचल प्रदेश के मेचुका पहाड़‍ियों के पास उड़ते समय जब 3 जून को भारतीय वायुसेना का मालवाहक विमान एएन-32 रडार से लापता हुआ तो सुरक्षा बलों को अहसास हो गया था कि उन्‍हें अब विकट स्थिति का सामना करना होगा। विमान को ढूंढने का काम कुछ इस तरह से था जैसे भूसे के ढेर से सुई को तलाश करना। यही नहीं उन्‍हें यह भी पता था कि केवल तकनीक के जरिए बचाव अभियान या विमान को तलाश करना संभव नहीं होगा। वायुसेना ने विमान की तलाश के लिए अपने अत्‍याधुनिक निगरानी विमान लगाए लेकिन सफलता अंतत: स्‍थानीय शिकारियों के हाथ लगी।विमान लापता होने के एक दिन बाद कायिंग गांव के टी यूबी ने उसे तलाश करने का ऑफर दिया। टी यूबी को स्‍थानीय लोग टार्जन के नाम से बुलाते हैं। यूबी जब 40 के दशक में थे तब उन्‍होंने शिकार और मछली पकड़ने के परंपरागत तरीके को अपनाया था। वह बयोर पर्वत श्रेणी के इंच-इंच से वाकिफ हैं। इसी वजह से उन्‍हें ग्रामीण टार्जन के नाम से बुलाते हैं।मेचुका घाटी की ऊबड़ खाबड़ पहाड़‍ियों को देखकर ज्‍यादातर लोगों का उत्‍साह ठंडा पड़ जाएगा लेकिन अदि समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले यूबी आगे बढ़ते रहे। बता दें कि अदि समुदाय के लोग अरुणाचल के छह पहाड़ी जिलों में रहते हैं। स्‍थानीय शिकारियों और पुलिस तथा आर्मी के लोगों की दो टीमें यूबी के बैकअप के लिए भेजी गईं। तलाशी अभियान में सात जून को सफलता मिली जिससे पता चला कि सेना और वायुसेना की टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है।स्‍थानीय टीम लगातार आर्मी और और एयरफोर्स को सूचना दे रही थी। तमूत और टेकसेंग ने गांववालों से बात की तो पता चला कि विमान गसेंग गांव की ओर गया था। दो दिन पैदल चलने के बाद वे लोग 9 जून को गसेंग पहुंचे। अदि पहाड़ के पास विमान के मलबे को देखा और वहां तक चढ़ाई शुरू की। उन्‍होंने कहा कि विमान का मलबा लिपो से 16 किमी उत्‍तर में मिला जो मेचुका से 70 किमी दूर है। इसी दिशा में स्‍थानीय लोग भी इशारा कर रहे थे।

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