Dussehra 2018: जानिए कब मनाया जाएगा दशहरा, महत्व और परंपराओं के बारे में सब कुछ

हिंदू मान्यता के मुताबिक साल भर में तीन तिथियां बहुत शुभ फलदायक होती हैं। इनमें पहली तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, दूसरी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा और तीसरी दशहरा है। दशहरा शारदीय नवरात्र के ठीक बाद आने वाला पर्व है। आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान राम ने दश मुख वाले रावण को हराकर असत्य पर सत्य के विजय की प्रतिष्ठा की थी। इसलिए, इसे दशहरा तथा विजयादशमी कहा जाता है। यह हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। दशहरे के दिन होता है मां की मूर्तियों का विसर्जन दशहरे के दिन ही नौ दिन के व्रत का पारण किया जाता है। साथ ही दुर्गा पूजा के दौरान स्थापित दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन भी दशहरा के ही दिन किया जाता है। इस दिन देश भर में असत्य पर सत्य तथा अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाया जाता है। लोगों के घरों में पकवान बनाए जाते हैं। तमाम तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। रामलीला का मंचन होता है तथा रावण के पुतले जलाकर अपने अंदर की समस्त बुराइयों के संहार का संकल्प लिया जाता है।दशहरा कब मनाया जाता है?शरद नवरात्र के 10वें दिन और दीपावली से ठीक 20 दिन पहले दशहरा आता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयदशमी या दशहरे का त्योहार मनाया जाता है। इस बार दशहरा 19 अक्टूबर को है। तिथि और शुभ मुहूर्त दशमी तिथि प्रारंभ: 18 अक्टूबर को दोपहर 03 बजकर 28 मिनटदशमी तिथि समाप्त: 19 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 57 मिनट तकविजय मुहूर्त: 19 अक्टूबर को दोपहर 01 बजकर 58 मिनट से दोपहर 02 बजकर 43 मिनट तक।अपराह्न पूजा का समय: 19 अक्टूबर को दोपहर 01 बजकर 13 मिनट से दोपहर 03 बजकर 28 मिनट तक।दशहरा के दिन पूजा की परंपरा दशहरा का विजय मुहूर्त सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। मान्यता है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए इसी समय निकलना चाहिए। विजय मुहूर्त में गाड़ी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, आभूषण और वस्त्र खरीदना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मुहूर्त में कोई भी नया काम किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। इस दिन शस्त्र पूजा के साथ ही शमी के पेड़ की पूजा की जाती है। साथ ही रावण दहन के बाद थोड़ी सी राख को घर में रखना शुभ माना जाता है।क्यों मनाया जाता है दशहरा? दशहरा मनाए जाने को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं-- एक कथा के मुताबिक महिषासुर नाम का एक बड़ा शक्तिशाली राक्षस था। उसने अमर होने के लिए ब्रह्मा की कठोर तपस्या की। ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या से खुश होकर उससे वरदान मांगने के लिए कहा। महिषासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। इस पर ब्रह्माजी ने उससे कहा कि जो इस संसार में पैदा हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है इसलिए जीवन और मृत्यु को छोड़कर जो चाहे मांग सकते हो। ब्रह्मा की बातें सुनकर महिषासुर ने कहा कि फिर उसे ऐसा वरदान चाहिए कि उसकी मृत्यु देवता और मनुष्य के बजाए किसी स्त्री के हाथों हो। ब्रह्माजी से ऐसा वरदान पाकर महिषासुर राक्षसों का राजा बन गया और उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता युद्ध हार गए और देवलोकर पर महिषासुर का राज हो गया।महिषासुर से रक्षा करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ आदि शक्ति की आराधना की। इस दौरान सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य रोशनी निकली जिसने देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया। शस्त्रों से सुसज्जित मां दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक भीषण युद्ध करने के बाद 10वें दिन उसका वध कर दिया। इसलिए इस दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। महिषासुर का नाश करने की वजह से दुर्गा मां महिषासुरमर्दिनी नाम से प्रसिद्ध हो गईं।- एक दूसरी कथा के मुताबिक भगवान श्री राम ने लगातार नौ दिनों तक लंका में रहकर रावण से युद्ध किया। फिर 10वें दिन उन्होंने रावण की नाभि में तीर मारकर उसका वध कर दिया था। कहते हैं कि भगवान श्री राम ने मां दूर्गा की पूजा कर शक्ति का आह्वान किया था। श्री राम की परीक्षा लेते हुए मां दुर्गा ने पूजा के लिए रखे गए कमल के फूलों में से एक फूल को गायब कर दिया। राम को कमल नयन कहा जाता था इसलिए उन्होंने अपना एक नेत्र मां को अर्पण करने का निर्णय लिया। ज्यों ही वह अपना नेत्र निकालने लगे देवी प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हुईं और विजयी होने का वरदान दिया। फिर दशमी के दिन श्री राम ने रावण का वध कर दिया। कैसे मनाया जाता है दशहरा का त्योहार?दशहरा का त्योहार देश भर में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मैसूर और कुल्लू का दशहरा तो दुनिया भर में मशहूर है। नवरात्रि के नौ दिनों बाद 10वें दिन देश के अलग-अलग कोनों में रावण दहन और मेलों का आयोजन होता है। इस दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। दशमी के दिन दुर्गा पंडालों पर विशेष पूजा होती है। स्त्रियां मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाती हैं और फिर एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं। इसे सिंदूर खेला कहा जाता है। इसके बाद दुर्गा मां की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। इस दिन क्षत्रिय शस्त्र पूजा करते हैं, जबकि ब्राह्मण शास्त्रों का पूजन करते हैं। वहीं व्यापार से जुड़े वैश्य लोग अपने प्रतिष्ठान और गल्ले की पूजा करते हैं। साथ ही नई दुकान या कारोबार का शुभारंभ भी करते हैं। दरअसल, प्राचीन काल में क्षत्रिय युद्ध पर जाने के लिए इस दिन का ही चुनाव करते थे। ब्राह्मण दशहरा के ही दिन विद्या ग्रहण करने के लिए अपने घर से निकलता था। मान्यता है कि दशहरा के दिन शुरू किए गए काम में विजय अवश्य मिलती है। विजयदशमी पर शमी के वृक्ष की पूजा का भी विधान है।
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